हे मात अंबिके !

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।।पावन नवरात्रि पर निवेदन।।
हे मात अंबिके!
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हे मात अंबिके
प्रणाम, मां दिगंबरा ।
प्रभामयि तव प्रभाव से
आलोकित है वसुंधरा ।।
तुम ब्रह्मानंद हो,
हो तुम ही जगत सृजन ।
तव भृकुटि कटाक्ष से
ब्रह्मांड का होता लयन ।।
हो तुम ही शिव की शिवा
जगदीश की प्रियम्बरा ।
हे मात अंबिके
प्रणाम ,मां दिगंबरा।।१।।
शांत ,सौम्य, रूप में
हो दीप्त मां जगदीश्वरी।
स्निग्ध, हास्य भाव से
आनंदित सदा माहेश्वरी।।
तुम ही जगत की प्राण हो
मृत्यु – सी हो भयंकरा।
हे मात अंबिके
प्रणाम ,मां दिगंबरा।।२।।
तुम ही जगत विनोदिनी
ब्रह्ममाया मोहिनी।
अखंड, अरूपा शक्तिमया
भक्तार्थ लीला धारिणी।।
जो हुआ रत युग चरण तल
उसके लिए तुम अभयकरा।
हे मात अंबिके
प्रणाम ,मां दिगंबरा।।३।।
करो नाश माते
आसुरी वृत्तियों का तत्क्षण।
है जो तुम्हारे ही शरण में
उनका करो जननी नित रक्षण।।
ब्रह्माणी माता , प्राणस्वरूपा
तुम अखंड ज्योतिर्धरा।
हे मात अंबिके
प्रणाम ,मां दिगंबरा।।४।।
जगत का करो कल्याण मां
त्रिताप – पाप को हरो।
प्राणी मात्र के ह्रदय में
जननी सदा संचरो।।
ओंकार स्वरूपिणी अनादिनी
अनंत अव्यक्त अक्षरा।
हे मात अंबिके
प्रणाम ,मां दिगंबरा।
प्रभामयि तव प्रभाव से
आलोकित है वसुंधरा।।५।।
ॐॐॐॐॐ (कवि – डॉक्टर विजय शाही  ‘शिवांश’)


 

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