***अज्ञात कवि की कविता***

0
184
  1. ***अज्ञात कवि की कविता***
    यह कविता जिसने भी लिखी प्रशंसनीय है।
    हिन्दी वर्णमाला के क्रम से कवितामय प्रयोग-बेहतरीन है।
    *अ* चानक
    *आ* कर मुझसे
    *इ* ठलाता हुआ पंछी बोला
    *ई* श्वर ने मानव को तो
    *उ* त्तम ज्ञान-दान से तौला
    *ऊ* पर हो तुम सब जीवों में
    *ऋ* ष्य तुल्य अनमोल
    *ए* क अकेली जात अनोखी
    *ऐ* सी क्या मजबूरी तुमको
    *ओ* ट रहे होंठों की शोख़ी
    *औ* र सताकर कमज़ोरों को
    *अं* ग तुम्हारा खिल जाता है
    *अ:* तुम्हें क्या मिल जाता है.?
    *क* हा मैंने- कि कहो
    *ख* ग आज सम्पूर्ण
    *ग* र्व से कि- हर अभाव में भी
    *घ* र तुम्हारा बड़े मजे से
    *च* ल रहा है
    *छो* टी सी- टहनी के सिरे की
    *ज* गह में, बिना किसी
    *झ* गड़े के, ना ही किसी
    *ट* कराव के पूरा कुनबा पल रहा है
    *ठौ* र यहीं है उसमें
    *डा* ली-डाली, पत्ते-पत्ते
    *ढ* लता सूरज
    *त* रावट देता है
    *थ* कावट सारी, पूरे
    *दि* वस की-तारों की लड़ियों से
    *ध* न-धान्य की लिखावट लेता है
    *ना* दान-नियति से अनजान अरे
    *प्र* गतिशील मानव
    *फ़* रेब के पुतलो
    *ब* न बैठे हो समर्थ
    *भ* ला याद कहाँ तुम्हें
    *म* नुष्यता का अर्थ.?
    *य* ह जो थी, प्रभु की
    *र* चना अनुपम…
    *ला* लच-लोभ के
    *व* शिभूत होकर
    *श* र्म-धर्म सब तजकर
    *ष* ड्यंत्रों के खेतों में
    *स* दा पाप-बीजों को बोकर
    *हो* कर स्वयं से दूर
    *क्ष* णभंगुर सुख में अटक चुके हो
    *त्रा* स को आमंत्रित करते
    *ज्ञा* न-पथ से भटक चुके हो.!!

*****////******////////*****

Raipur Dunia

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here